Wednesday, August 17, 2016

मधुमेह क्या है?

भाग-(क)

मधुमेह क्या है?


‘डायबिटीज मेलाइट्स’ एक जाना-पहचाना रोग है, जिसमें रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा शरीर की कोशिकाएं शर्करा का उपयोग नहीं कर पातीं। यह रोग ‘इंसुलिन’ नामक रसायन की कमी से होता है, जिसका स्राव शरीर में अग्नाशय (पैंक्रियाज) द्वारा होता है। 

डायबिटीज मेलाइट्स (हारपरग्लाइसीमिया, हाई शुगर, हाई ग्लूकोज, मधुमेय ग्लूकोज इनटोलरेंस के नाम से भी जाना जाता है), का साधारण भाषा में अर्थ है–‘मीठा मूत्र’ क्योंकि प्रायः देखा गया है कि मधुमेह रोगियों के मूत्र में शर्करा पाई जाती है। उच्च रक्तचाप तथा मोटापे के साथ इस रोग को ‘मेटाबॉलिक सिंड्रोम’ कहा जाता है। इस रोग को मेलाइट्स इसलिए कहते हैं ताकि इसे डायबिटिज इंसीपिडस (Insipidus) से अलग किया जा सके जिसमें बहुमूत्र की समस्या तो आती है परंतु मूत्र में शर्करा नहीं पाई जाती। डायबिटीज मेलाइट्स सामान्यतः ‘डायबिटीज’ के नाम से ही प्रसिद्ध है। डायबिटीज या मधुमेह एक ऐसा रोग है जिसमें रोगी कभी भी तत्काल लक्षणों की शिकायत नहीं करते किंतु रक्त में ग्लूकोज का बढ़ता हुआ स्तर शरीर के भीतर अवयवों तथा हृदय व गुर्दे आदि को भी नष्ट कर देता है इसलिए इसे ‘धीमी मौत’ भी कहते हैं। 

यह एक दीर्घकालीन रोग है, रोगी 30-40 वर्ष तक इस रोग के साथ जीवित रहते हैं। यदि रोगी अपनी ब्लड ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रखे तथा पूरी देखभाल करे तो रोग उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। वैसे तो नियमित खान-पान ही रोग को काफी हद तक संभाल लेता है किंतु व्यायाम, तनाव प्रबंधन, योग तथा रोग की संपूर्ण जानकारी के साथ रोग का निदान और भी सरल हो जाता है। यदि इस रोग से संबंधित इन बातों पर पूरा ध्यान दिया जाए तो रोगी को दवाओं का सेवन भी नहीं करना पड़ता। 

कई बार जीवनशैली में सुधार तथा दवाओं के प्रयोग से भी रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि रक्त में ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रखने के अन्य उपाय कारगर न रहे तो इंसुलिन एक रामबाण औषधि के रूप में मौजूद है। 

मधुमेह क्यों होता है? 
हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट एक प्रमुख तत्त्व है, यही कैलोरी व ऊर्जा का स्रोत है। वास्तव में शरीर के 60 से 70% कैलोरी इन्हीं से प्राप्त होती है। कार्बोहाइड्रेट पाचन तंत्र में पहुंचते ही ग्लूकोज के छोटे-छोटे कणों में बदल कर रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं इसलिए भोजन लेने के आधे घंटे भीतर ही रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा दो घंटे में अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है। 

दूसरी ओर शरीर तथा मस्तिष्क की सभी कोशिकाएं इस ग्लूकोज का उपयोग करने लगती हैं। ग्लूकोज छोटी रक्त नलिकाओं द्वारा प्रत्येक कोशिका में प्रवेश करता है, वहां इससे ऊर्जा प्राप्त की जाती है। यह प्रक्रिया दो से तीन घंटे के भीतर रक्त में ग्लूकोज के स्तर को घटा देती है। अगले भोजन के बाद यह स्तर पुनः बढ़ने लगता है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति में भोजन से पूर्व रक्त में ग्लूकोज का स्तर 70 से 100 मि.ग्रा./डे.ली. रहता है। भोजन के पश्चात यह स्तर 120-140 मि.ग्रा./डे.ली. हो जाता है तथा धीरे-धीरे कम होता चला जाता है। 

मधुमेह में इंसुलिन की कमी के कारण कोशिकाएं ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पातीं क्योंकि इंसुलिन के अभाव में ग्लूकोज कोशिकाओं में प्रवेश ही नहीं कर पाता। इंसुलिन एक द्वार रक्षक की तरह ग्लूकोज को कोशिकाओं में प्रवेश करवाता है ताकि ऊर्जा उत्पन्न हो सके। यदि ऐसा न हो सके तो शरीर की कोशिकाओं के साथ-साथ अन्य अंगों को भी रक्त में ग्लूकोज के बढ़ते स्तर के कारण हानि होती है। यदि स्थिति उस प्यासे की तरह है जो अपने पास पानी होने पर भी उसे चारों ओर ढूंढ़ रहा है। 

इन द्वार रक्षकों (इंसुलिन) की संख्या में कमी के कारण रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ कर 140 मि.ग्रा./डे.ली. से भी अधिक हो जाए तो व्यक्ति मधुमेह का रोगी माना जाता है। असावधान रोगियों में यह स्तर बढ़ कर 500 मि.ग्रा./ड़े.ली. तक भी जा सकता है। 

मधुमेह रोग जटिलताओं में भरा है। सालों साल यदि रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ा रहे तो प्रत्येक अंग की छोटी रक्त नलिकाएं नष्ट हो जाती हैं जिसे माइक्रो एंजियोपैथी कहा जाता है। तंत्रिकातंत्र की खराबी ‘न्यूरोपैथी, गुर्दों की खराबी ‘नेफरोपैथी’ व नेत्रों की खराबी ‘रेटीनोपैथी’ कहलाती है। इसके अलावा हृदय रोगों का आक्रमण होते भी देर नहीं लगती। 

मधुमेह के प्रकार


डायबिटीज मेलाइट्स को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है– 

1. आई.डी.डी.एम. इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन, आश्रित मधुमेह) टाइप–। 
2. एन.आई.डी.डी.एम. नॉन इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह) टाइप–॥ 
3. एम.आर.डी.एम. मालन्यूट्रिशन रिलेटिड डायबिटीज मेलाइट्स (कुपोषण जनित मधुमेह) 
4. आई.जी.टी.(इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस) 
5. जैस्टेशनल डायबिटीज 
6. सैकेंडरी डायबिटीज 

1. टाइप–। (इंसुलिन आश्रित मधुमेह)–टाइप–। मधुमेह में अग्नाशय इंसुलिन नामक हार्मोन नहीं बना पाता जिससे ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं दे पाता। इस टाइप में रोगी को रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य रखने के लिए नियमित रूप से इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। इसे ‘ज्यूविनाइल ऑनसैट डायबिटीज’ के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग प्रायः किशोरावस्था में पाया जाता है। इस रोग में ऑटोइम्यूनिटी के कारण रोगी का वजन कम हो जाता है। 

2. टाइप-।। (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह)–लगभग 90% मधुमेह रोगी टाइप-।। डायबिटीज के ही रोगी हैं। इस रोग में अग्नाशय इंसुलिन बनाता तो है परंतु इंसुलिन कम मात्रा में बनती है, अपना असर खो देती है या फिर अग्नाशय से ठीक समय पर छूट नहीं पाती जिससे रक्त में ग्लूकोज का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। इस प्रकार के मधुमेह में जेनेटिक कारण भी महत्वपूर्ण हैं। कई परिवारों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है। यह वयस्कों तथा मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों में धीरे-धीरे अपनी जड़े जमा लेता है। 

अधिकतर रोगी अपना वजन घटा कर, नियमित आहार पर ध्यान दे कर तथा औषधि ले कर इस रोग पर काबू पा लेते हैं। 

3. एम.आर.डी.एम.(कुपोषण जनित मधुमेह)–भारत जैसे विकासशील देश में 15-30 आयु वर्ग के किशोर तथा किशोरियां कुपोषण से ग्रस्त हैं। इस दशा में अग्नाशय पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। रोगियों को इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ते हैं। मधुमेह के टाइप–। रोगियों के विपरीत इन रोगियों में इंसुलिन के इंजेक्शन बंद करने पर कीटोएसिडोसिस विकसित नहीं हो पाता। 

4. आई.जी.टी.(इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)–जब रोगी को 75 ग्राम ग्लूकोज का घोल पिला दिया जाए और रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य तथा मधुमेह के बीच हो जाए तो यह स्थिति आई.टी.जी. कहलाती है। इस श्रेणी के रोगी में प्रायः मधुमेह के लक्षण दिखाई नहीं देते परंतु ऐसे रोगियों में भविष्य में मधुमेह हो सकता है। 

5. जैस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावस्था के दौरान)–गर्भावस्था के दौरान होने वाली मधुमेह जैस्टेशनल डायबिटीज कहलाती है। 2-3% गर्भावस्था में ऐसा होता है। इसके दौरान गर्भावस्था में मधुमेह से संबंधित जटिलताएं बढ़ जाती हैं तथा भविष्य में माता तथा संतान को भी मधुमेह होने की आशंका बढ़ जाती है। 

6. सेकेंडरी डायबिटीज–जब अन्य रोगों के साथ मधुमेह हो तो उसे सेकेंडरी डायबिटीज कहते हैं। इसमें अग्नाशय नष्ट हो जाता है जिससे इंसुलिन का स्राव असामान्य हो जाता है, जैसे– 

(1) अग्नाशय से संबंधित रोग– 
अग्नाशय में सूजन 
अग्नाशय का कैंसर 

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